Hindi Story about a Little Orphan Girl
जाड़े के दिन थे| दोपहर के तीन बजे थे| मालती छत पर बैठी मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी| बच्चे अभी स्कूल से नही आये थे और पति ऑफिस में थे| अचानक फेरी लगाती हुई छोटी पांच वर्षीय चंपा और उसके पिता शंकर की आवाज़ आई|
“चूड़ी लेलो, रंग बिरंगे कामदार कलाई की शोभा बढ़ाने वाली चूड़ियाँ!” फिर चंपा अपनी तोतली आवाज़ में पुकारती, “चूली लेलो, अच्छी-अच्छी हैं हमारे पास!”
मालती रोज़ यह आवाजें सुनति थी पर कभी उन्हें रोका नही| आज पता नही क्यूँ उसने उठकर मुंडेर से झाँका और पुकारा, “चंपा रुक जा, मैं देखूँगी आज!”
नीचे उतरकर उसने बरामदे में आकर दरवाज़ा खोला और हाथ लगाकर टोकरी उतरवाई|
“शंकर आज तो बड़े प्यारे रंगों की चूड़ियाँ लाए हो| ज़रा गुलाबी और पीले रंग की कामदार चूड़ियाँ मेरे नाप कि निकालो|”
“बीबीजी आपको तो सवा दो माप चलेगा| अभी दिखाता हूँ,” कहकर शंकर ने नीचे से संभाल कर सुंदर चूड़ियाँ दिखाईं| मालती ने पसंद करके दोनो रंगों के दो-दो दर्जन लिए| चालीस रुपये पाकर शंकर खुश हो गया|

कहने लगा, “आज बीबीजी, बिलकुल भी बिक्री नही हुई थी| मैं सोच रहा था की आज तो फांके करने पड़ेंगे पर आपकी वजह से रोटी का इंतज़ाम अपनी चंपा के लिए कर पाऊंगा| जब से इसकी माँ इस दुनिया से गयी है, मुझे इसकी बड़ी चिंता रहती है| जी रहा हूँ तो बस इसके लिए वर्ना पार्वती के बिना जिया नही जाता,” कहते कहते उसकी आँखें भर आईं|
“तुमने बताया नही शंकर तुम्हारी बीबी को क्या हुआ था? क्या बीमार थी?” मालती ने पूछा| “हाँ बीबीजी उसे मलेरिया हो गया था| गाँव में ठीक से इलाज नही हो पाया और शहर लाने के पेहले ही चल बसी|” शंकर ने भारी आवाज़ मे कहा|
इस बीच, चंपा सब कुछ चुपचाप सुनति हुई टोकरी सजा रही थी| कभी मालती को देखती तो ऐसा लगता जैसे कुछ कहना चाहती हो पर नही कह पा रही|
“चंपा तेरे लिए दीदियों ने गुड़िया दी है| ठहर, मैं अभी लाती हूँ,” कहते हुए मालती अन्दर चली गयी| जब बाहर आयी तो उसके हाथ मे एक दुल्हन के कपड़ों में सजी गुड़िया थी| चंपा को देते हुए उसने कहा, “लो चंपा, इसे अपने पास रखना| यह अब तेरी गुड़िया है|”
चंपा ने गुड़िया लिया और मुस्करा दिया| मालती को अचानक लगा जैसे कई फूल एक साथ खिल गए हों, इतनी प्यारी थी उस नन्ही सी जान की मुस्कान| “अच्छा बीबीजी, अब कभी नए डिजाईन की चूड़ियाँ लाऊंगा तो आपको पहले दिखा दूंगा| लेना न लेना आपकी मर्ज़ी| चल चंपा, आगे चलें| भगवान् चाहेंगे तो अच्छी बोहनी के बाद थोड़ी और बिक्री हो जाएगी.”
शंकर ने कहते हुए टोकरी को सर पर जमा लिया| चंपा ने एक हाथ में गुड़िया पकड़ी और दुसरे से पिता का कुर्ता थाम लिया|
शाम को पति के आने पर उसने चूड़ियाँ दिखायीं तो विनय ने कहा, “और रंगों की ले ली होती| मैं चाहता हूँ तुम्हारी कलाईयाँ हर रोज़ रंग बिरंगे चूड़ियों से भरा रहे| आजकल की औरतें तो खाली हाथ रहना चाहती हैं| भाई मुझे तो बिलकुल पसंद नहीं”|
“अंजू और मंजू ने भी पिता की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहाँ, “माँ तुम रोज़ नए नए रंग की साड़ी के साथ मैचिंग चूड़ी पहना करो, बहुत अच्छी लगती हैं|”
अंजू ग्यारहवी में पढ़ रही थी और मंजू आठवी में| पास ही मे उनका स्कूल था| पैदल ही चली जाती थीं| विनय का ऑफिस दूर था पर प्राइवेट कंपनी होने के कारण चार्टर्ड बस में आने जाने की सुविधा थी| विनय के विनम्र स्वभाव के कारण उनके बॉस उन्हें बहुत पसंद करते थे|
करीब दो हफ्ते बीत गए| फिर एक दोपहर, कुछ सिलाई के काम के लिए मालती छत पर बैठी थी| अचानक किसी की आवाज़ आई, “चूली ले लो, अच्छी अच्छी लाई हूँ|” मालती ने नीचे गली में झाँका तो देखा की चंपा एक छोटी चूड़ियों की टोकरी सर पर उठाये चल रही थी|
मालती ने पुकारा, “रुक जा चंपा| अभी आती हूँ|” मालती ने बाहर का दरवाज़ा खोला तो चंपा झट उसके पास आ गई| टोकरी उतरवा कर मालती ने पुछा, “तेरे बापू कहाँ रह गए? तू अकेले क्यूँ आई है?” “इतना कहना था की चंपा उसके गले लिपटकर रोने लगी|
“बापू मल गए बीबीजी, गाड़ी के नीचे आ गए|” मालती की आँखें भी भीग गयीं और उसने चंपा को चुप कराते हुए कहा, “रो मत चंपा| मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी| तू बैठ, मैं तेरे लिए बिस्कुट और शरबत लाती हूँ|” चंपा को बिस्कुट और शरबत देते हुए मालती ने पूछा, “चंपा अब तू किसके साथ रहती है?”
“मेला कोई नही है बीबीजी| माँ की तो मुझे याद भी नही है| अकेले झुग्गी में रहती हूँ,” कहते हुए चंपा की आँखें दुबारा भीग उठीं| “क्या तुम्हारा कोई रिश्तेदार नही है चंपा?” मालती ने उसकी आँखों से ढलते आंसू को अपनी आँचल से पोंछते हुए पुछा|
“नही बीबीजी, बापू था मेला और कोई भी नही|” “रात को अकेले सोते डर नही लगता?” “रात को मैं सोती ही नही हूँ, बैठी रहती हूँ| दिन में ठोला ठोला सो लेती हूँ|” “और खाने का क्या करती हो?” “थोले पैसे बापू ने मेले शादी के लिए छुपा लक्खे थे उन्ही से डबल लोटी और चाय पास की दूकान से खा लेती हूँ”|
छोटी सी चंपा की बातों को सुनकर मालती की आँखें भर आईं और उसने झट चंपा को गोद में बिठा लिया| इस निर्दयी समाज के ठेकेदारों में इतनी हिम्मत कहाँ जो वे एक अनाथ बेसहारा नन्ही सी जान की देखभाल कर सकें| बेचारी ने कितने दिनों से घर का खाना नही खाया था| कैसे लोग रहते थे उसके आसपास जिन्होंने इतना भी नही सोचा| आज के लोग मनुष्य कम पशु ज्यादा लगने लगे हैं| किसी को खुद के सिवा किसी की परवाह ही नही है| धिक्कार है ऐसे समाज और उसमें रहने वाले खुदगर्ज़ लोगों पर|
अनायास ही मालती चंपा को गोद में हिलाने लगी थी और उसे इसका आभास भी नही हुआ| सोचते सोचते और यूँ ही बैठे शाम हो गई| बच्चे भी स्कूल से आ गए| चंपा गोद में ही सो चुकी थी| उसे अन्दर सुलाकर और उसकी टोकरी रखकर मालती ने बच्चों को उसके पिता के बारे में बताया तो दोनो एक साथ बोल पड़ीं, “माँ तुम इसे अपने पास ही रख लो| समझ लो तुम्हे दो नहीं तीन बेटियाँ हैं| और हाँ माँ, यह हमारे स्कूल मे ही पढ़ेगी| मैं मैम से बात करुँगी,” अंजू ने कहा|
मालती को लगा जैसे उसकी मानसिक गुत्थी बच्चों के प्यार ने मिलकर सुलझा दिया है| वह खुद भी यही तो चाहती थी| इतना सोचकर ही की छोटी सी प्यारी सी चंपा आज फिर डबल रोटी चाय पर गुज़ारा करने अकेली झुग्गी मे रात बिताएगी, उसका मन ख़राब होने लगा था| लेकिन इतनी बड़ी बात वह पति की राए के बिना तै नही कर सकती थी|
बेसब्री से विनय का इंतज़ार करने लगी| आखिर घड़ी ने साढ़े छे बजा ही दिया और दरवाज़े की घंटी बजी| मालती ने दौड़कर दरवाज़ा खोला और पति का ब्रीफ़केस सँभालते हुए चाय लाती हूँ कहकर अन्दर गयी|
चाय नाश्ते के बाद धीरे धीरे मालती ने विनय को चंपा के बारे में सब कुछ बताया| विनय ने सारी बातें सुनी और फिर मालती से कहा, “तुम अच्छी तरह सोच को मालती, पालना तो तुम्हे ही है| मुझे कोई ऐतराज़ नही| आखिर इंसान की बच्ची है| लोग जानवर पालते हैं तो क्या हम ऐसे गए-बीते हैं की हम एक नन्ही बेसहारा बच्ची को नही पाल सकते! मैं सोचूंगा की भगवान् ने मुझे तीन बेटियाँ दी हैं|”
मालती ने उठकर पति के पैर छू लिए| उनकी बातों से उसका दिल भर आया था| भगवान ने उसे ऐसा समझदार पति दिया था जिसके लिए वह सदा आभारी रहेगी| पति के सहारे, सलाह और मदद के बिना वह चंपा को गोद लेने का निश्चय नही कर सकती थी|
करीब घंटे बाद अचानक चंपा की नींद खुली तो उसने खुद को मंजू के पास पाया| घबरा कर उठती हुई उसने पुकारा, “बीबीजी गलती हो गई| मैं सो गई| अच्छा अब घर जाती हूँ|”
मालती ने उसे गोद में उठाते हुए कहा, “नही चंपा, अब तू कहीं नहीं जाएगी| मैं तुम्हे हमेशा के लिए अपने पास अपनी बेटी बनाकर रखूंगी|”
“सच बीबीजी, मैं दीदी के पास रहूंगी?” कहते-कहते चंपा हँसने लगी और उसकि मधुर गुंजन पूरे घर में सुगंध की तरह फैल गयी|
डिस्क्लेमर: यह एक काल्पनिक कहानी है|
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